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आपका -विपुल

आधी रात का वक़्त था औऱ बाहर कमरे का तख्त ।
घूं घूं करके मोबाइल बजा ,हाथ बढ़ा कर उठाया।
साढ़े बारह का एलार्म लगाया था।
ऑफिस का काम करना था।
मुंह धोने वाशबेसिन पहुंचा।
मुंह धोकर शीशा देखा।
चौंक गया।
मेरे पीछे एक आतीं सुंदर स्त्री गहनों से लदी फंदी मुझे देख मुस्कुरा रही थी।

मेरी बीवी नहीं थी,
कौन थी वो ?
मैं पलटा ।कोई नहीं था।
वहम था।
मैंने खुद को समझाया।
पत्नी को जगाना नहीं चाहता था।कॉफी बनानी थी।नींद कैसे दूर रहेगी ?
किचन का दरवाजा खोला
गैस जलाई ।दूध के लिये फ्रिज खोला।
ये फ्रिज में सब्जी की बास्केट की जगह एक सफेद बालों वाली झुर्रियों वाली बुढ़िया।

मैं स्तब्ध था।
डर से मुंह के बल गिरा ,
फिर उठा तो वहाँ बुढ़िया नहीं सब्जी की बास्केट ही थी।
जिसके ऊपर दूध का भगौना था।
मैंने दूध का भगौना लिया ,फ्राई पैन में आधा पानी आधा दूध ,शक्कर ,कॉफी डाली ।खौलाई।
तभी मेरी नज़र किचन के खुले दरवाजे की ओट पर पड़ी।
काले कपड़ों में अज़ीब सी औरत।

उसकी आँखों में अज़ीब सा आकर्षण था।
अचानक पीछे से अज़ीब सी आवाज आई।
पलट कर देखा कॉफी खौल कर गिरने की आवाज़ थी।
दोबारा पलट कर दरवाजे की ओट की तरफ देखा।
कोई नहीं।
भ्रम था शायद।
कॉफी कप में भर कर चला ही था स्टडी टेबल की ओर

कि लाइट चली गई।
पड़ोसी का कुत्ता अचानक मनहूस आवाज़ में रोने लगा।

छंन्न
छ्न्न
उस अंधेरे गलियारे में पायल की आवाज़।
जो गलियारा मेरे किचन से स्टडी रूम जाता था।
“शुइं¿¿¿¿¿”
“पटाख”
“धाड़ धाड़”

बाहर पटाखे नहीं छूटे थे।
ये टीवी की आवाज़ थी जो अचानक खुल गई थी।एक्शन सीन चल रह था।
लेकिन टीवी के आगे ये बच्चा कौन ?
क्या हो रहा है ये ?

मै घबरा ही जाता अगर मेरी बीवी एन मौके पर इमरजेंसी लाइट लेकर गलियारे में न आ जाती।
“क्या हुआ जान ?
“जान ?”
मैं चौंका।
ये मेरी पत्नी नहीं थी।
शक्ल छोड़ के कुछ भी मेरी बीवी जैसा नहीं।
कुछ ज़्यादा ही लम्बी ,पतली सी औरत ।
काली नाइटी में मेरी बीवी की शकल वाली वो काली शक्ति मुझे देख मुस्कुराई।
सिहरन।
“टीवी बन्द करो !हमेशा खुली छोड़ देते हो”
उसने ऐसे स्वर में बोला जैसे बहुत दूर से कोई आवाज़ आई हो ।
मैंने टीवी की ओर देखा
बन्द
करने बढ़ा ही था।
कि

“हीं हीं हीं”
“हीं हीं हीं”
एक भयानक साया टीवी से बाहर आने की कोशिश में था।
वही हंस रहा था।
लंबे बाल ,घिनौनी सूरत ,सफेद चोला।

वो बच्चा जो थोड़ी देर पहले टीवी के सामने था ।
टीवी से निकली औरत उसे खा रही थी।
मैं स्तब्ध ।
लेकिन मेरी बीवी का भेष धरे उस काली ताकत पर कोई प्रभाव न पड़ा। ।
उसने अपना रूप दिखाया
“मुझे भी खाना है।”
मेरी बीवी जैसी दिखती वो काली ताकत मिनमिनी सी आवाज़ में बोली।
हंसी। ऐसी हंसी कि
रूह कांप गई मेरी।

मेरे पसीने आ गए थे। दिमाग जड़ और शरीर सुन्न।
उस बच्चे को बीच से चीर कर जब टीवी से निकली औरत ने मेरी बीबी का भेष धरे काली ताकत को बच्चे का आधा जिस्म दिया तो मैं चीख मार के बेहोश ही हो गया ।

आंख खुली तो मैं एक जंगल में था।
घने जंगल में
झींगुरों की तीखी आवाज और उल्लुओं की चीख।

मुझे धीरे धीरे याद आया । क्या हुआ था।।
मौसम में सर्दी सी थी ।
अचानक सायं सायं की आवाज के साथ तेज हवाएं चलने लगी थीं।
माहौल एकदम खौफनाक था।
उठने की कोशिश की , ऐसा लग रहा था कोई मुझे जबरन उठने से रोक रहा है। छाती पर धक्के देकर।
मैं बमुश्किल तमाम उठा।
घुंघरुओं की आवाज ।

दिल की धड़कन रुकने को ही थी।
घुंघरुओं की आवाज मेरे पास आती चली गई।
थोड़ी देर बाद मेरे सामने
एक लम्बे बालों वाली
काला चोला पहने
लाल आंखों वाली शख्सियत
हाथ में चिमटा
पैरों में घुंघरू और
जुबान पर!
अरे ये क्या ?
उसके तो तीन जुबानें थीं।
एक मुंह से निकल रही थी
दो गालों से।
हे भगवान।

उस तीन लपलपाती जीभों वाली इंसाननुमा चीज ने मुझे देखा और फिर मेरी तरफ हाथ बढ़ाया।
मैं कुछ समझने की हालत में नहीं था अभी।
क्या हो रहा था ?
उस इंसान नुमा चीज का हाथ अचानक लंबा होता चला गया।
मेरे चेहरे के पास से होते हुए मेरे पीछे।
उस हाथ की बर्फानी ठंडक महसूस की मेरे बाएं गाल ने।

और जब वो हाथ वापस लौटा तो उस हाथ में एक अजगर था।
” आज के खाने का इंतजाम हो गया”
ऐसी आवाज आई उस इंसान नुमा चीज के मुंह से,जैसे मटके में रख कर स्पीकर चला दिया हो। वो भी फटा हुआ स्पीकर ।
मेरी तरफ हिकारत भरी नज़रों से देख बोला।
“जान बचाना है तो बगैर पीछे देखे अपनी बाईं तरफ भाग ले”

मैं सोचने समझने की हालत में नहीं था।
यहां क्या हो रहा है?
क्यों हो रहा है?
मैं यहां हूं ही क्यों?
ये सोचने का समय बचा नहीं था।
क्योंकि उस इंसान नुमा चीज जैसे 10 12 और लोग अब तक वहां आ चुके थे और मुझे ऐसे घूर रहे थे जैसे नॉर्थ इंडियन राजमा चावल को घूरते हैं!

खाने के ठीक पहले।

मैं सर पर पांव रख कर भागा ।
वो सब मेरे पीछे थे ।
रोज जो दस किलोमीटर दौड़ लगाता था पहले, वो प्रैक्टिस काम आ रही थी।
घने जंगलों से होता मैं लगातार भाग रहा था।
दूर कुछ रोशनी दिखाई दी।
ये शायद सड़क थी क्या ?
मुझे एक बस की आवाज भी सुनाई पड़ी।
500 मीटर और भागते ही
मैं एक सड़क पर था।

तभी!
चिंचियाते हुए ब्रेकों की आवाज!
मेरे सड़क पर पहुंचते ही एक बस मेरे पास आकर रुकी। रुकी क्या इतनी धीमी हुई कि कोई भी चढ़ सके बस में।

“कहां जाना है?”
बस कंडक्टर बस की सीढ़ियों से पूंछ रहा था।
“जहां भी ये बस जा रही हो।”
कहकर मैं बस में चढ़ गया।
पूरी बस भरी थी मात्र एक सीट छोड़कर जो दरवाजे के पास थी
बस में सब हाई फाई लोग ही थे।

सूट पहने आदमी और स्कर्ट ब्लाउज पहने औरतें हाई सोसायटी के ही हो सकते थे।
बस में हर पुरूष सूट में था और औरतें स्कर्ट ब्लाउज या लेडीज पैंट सूट में।
दो दो की सीटें थीं बस में।
बस में आधी तो औरतें ही थीं लेकिन मेरी बगल में एक खड़ूस आदमी ही बैठा था।
आधी रात को अखबार पढ़ रहा था।

“बस कहां जा रही है?”
मैंने कंडक्टर से पूंछा।
और पूरी बस में ठहाके गूंज गए।
मैंने कोई गलत बात पूंछ दी थी क्या ?
“हंस क्यों रहे हैं सब?”
मैंने कंडक्टर से पूंछा जो अभी भी हंस रहा था।
“ये सब इसलिए हंस रहे हैं क्योंकि तुम इनके जाल में फंस गए हो।”
मेरी बगल में बैठा व्यक्ति बोला।

उसने अखबार के पीछे से ही दोबारा बोला “पहला मौका मिलते ही बस से कूद लेना। ये सब कौन हैं तुम्हें जानने की जरूरत नहीं। बस ये जान लो अगर इस बस से अगले 10 मिनट में नहीं उतर पाए तो कभी इस बस से नहीं उतर पाओगे “
“आप कौन? ये क्या बोल रहे?”
ये सवाल मेरे गले से निकल ही न पाए जब —

उस आदमी ने अपने चेहरे के सामने से अखबार हटाया ।
चेहरा?
नहीं नहीं भाई!
चेहरा ही तो नहीं था उस जिस्म पर।
मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे। और तभी उस चेहरा विहीन भद्र पुरूष ने अपने दाएं हाथ से बस की खिड़की में धक्का दिया।
खिड़की क्या ये तो आपातकालीन द्वार था जो खुला था।
“कूदो “
वो गुर्राया।

मैं थोड़ा रुका,कुछ समझने की कोशिश कर ही रहा था कि मैंने गौर किया।
पूरी बस में अब सब स्त्री पुरूषों के कपड़े बदल चुके थे।
औरतें साड़ी या सलवार सूट में थीं।
मर्द पैंट शर्ट या भारतीय परिधानों में।
ये कब हुआ?
मैं सोच ही रहा था कि अचानक बस धीमी हुई।
“अभी उतर जाना!
मेरे बगल वाला बोला।

“ये बस कभी रुकती नहीं,बस धीमी होती है।”
मैंने ध्यान दिया। मेरे लिए भी बस बिलकुल नहीं रुकी थी।बस इतनी धीमी हुई थी कि मैं आराम से चढ़ सकूं ।
“कहां जाना है?”
कंडक्टर सीढ़ियों पर उतर कर बोला ही था कि मैंने आपात कालीन दरवाजे से बाहर छलांग लगा दी।बगल में बैठे व्यक्ति के ऊपर से होते हुए।

इत्तिफाक की बात थी कि मैं जहां गिरा था, वहां ऊंची ऊंची घास ही थी और बस की स्पीड भी कम थी। ज्यादा चोट नहीं लगी।
बस आगे बढ़ चुकी थी।
मैं उसी सड़क पर आगे की ओर चलने लगा।
न आदमी न आदम जात।
सरदीली सर्द रात।
मेरी पदचाप मुझे ही डरा रही थी।
कि अचानक
“भौं भौं
भौं भौं “

कुत्तों की आवाज मेरे पीछे
से आ रही थी। मैंने पलट कर देखा।
कई जंगली कुत्तों का एक झुंड मेरे पीछे से आ रहा था।
मुझ पर झपटने को।
मैं सर पर पांव रख कर भागा।
आगे एक दोराहा था।
दाईं तरफ कच्चा रास्ता।
बाएं तरफ पक्की डामर रोड ।
बाईं तरफ ही भागा।
दाईं तरफ और भी जानवर हो सकते थे।
पक्की सड़क सुरक्षित लगी मुझे ।

बाएं तरफ की रोड पर भी कुत्ते मेरे पीछे ही लगे थे। पास आ रहे थे।मेरा दम फूल रहा था।
तभी मुझे अपने सामने कुछ रोशनी सी दिखाई दी।

थोड़ा और दौड़ने पर दिखा कि ये एक जुलूस सा था।
मशाल जुलूस
मौन जुलूस।
उस जुलूस में शामिल सभी लोग सफेद कपड़े पहने थे।
और हाथों में मशाल लिए थे।
कोई बोल नहीं रहा था।
मैं जुलूस में शामिल लोगों की पीठ ही देख पा रहा था।
मैंने उन जंगली कुत्तों से पीछा छुड़ाने के लिये उचित समझा कि इस जुलूस में शामिल हो जाऊं।
मैं जुलूस में घुस गया।
और जुलूस में शामिल सभी लोग अचानक थोड़े धीमे हो गए।

“कोई नया आदमी आया है क्या?”
एक पतली सी आवाज आई ।
आगे से।
जुलूस में सबसे आगे एक आदमी था।
बूढ़ा,गंजा, गोल चश्मा लगाए और बदन पे केवल एक सफेद धोती।
मैंने गौर किया।
वो एक प्लाई बोर्ड नुमा चीज पर पाल्थी मारे बैठा था।
जिस प्लाई बोर्ड के चारों कोनों पर चार लंबे से डंडे थे जिन्हें चार आदमी अपने कन्धों पर रखे थे।

“हां ! मैं!”
मैंने हाथ उठा कर कहा।
“जंगली कुत्ते पीछे पड़े थे।बचने के लिए आया हूं।”
“ये कुत्ते बड़े खतरनाक हैं। सही किया तुमने।”
वो बूढ़ा बोला।
“तुम हमारे साथ इस जंगल से निकल सकते हो।लेकिन हमारे जुलूस का एक नियम है।
सफेद कपड़े पहनकर ही हमारे साथ चल सकते हो।”

“लेकिन मेरे पास तो सफेद कपड़े नहीं हैं।”
मैं बोला तो बूढ़ा खिलखिला उठा।
“चिंता मत करो। हम इंतजाम रखते हैं अपने नए नवेले साथियों का।”
उसने किसी सौरभ को आवाज लगाई।
और अगले ही पल मेरे बाएं तरफ से आवाज आई
“हां हुजूर!”
मैंने देखा मेरी बाएं तरफ मेरा दोस्त सौरभ था और उसकी बीबी सारिका भी उसके बगल में। सौरभ के हाथों में एक सफेद गाउन सा था जैसा अस्पताल में मरीजों को पहनाते हैं।

“पहन लो बे।”
उसने दोस्ताना अंदाज में हंस कर कहा।
मैंने उसके हाथ से वो सफेद लबादा लिया और ये सोचा “आखिरी बार सौरभ और सारिका मुझे कब मिले थे?”
सौरभ और सारिका तो पिछ्ले 3 साल से मारीशस में थे ।

??????

मैं इसी सोच में था कि मेरे दाईं तरफ से बिल्कुल उसी चेहरारहित आदमी की सी आवाज सुनाई पड़ी, जो बस में मिला था।
“ये लबादा पहनने की सोचना भी मत।”
मैंने दाएं तरफ देखा।

वही था ये!
बस वाला!

उसके इस बार भी चेहरा नहीं था।
“ये कुत्ते इन सबके पालतू हैं।जंगली नहीं।शिकार लाते हैं जुलूस के लिए।”
मैं हतप्रभ था।
अप्रत्याशित रुप से अदभुत मामले हो रहे थे मेरे साथ।
“ये सफेद कपड़े पहन लोगे तो इस जुलूस से कभी बाहर नहीं निकल पाओगे।
केवल दस मिनट हैं तुम्हारे पास ।
ये कपड़ा फेंको और निकल लो। कोई रोके तो बेहिचक उसे धक्का दे देना।”
इतना कहने के साथ ही उस आदमी ने अचानक अपनी दाई तरफ के आदमी को धक्का दिया।
और बोला
“भाग दाएं।”
मैंने जरा सी जगह देखी उस आदमी के आगे जहां से मैं निकल सकता था।
बेइख्तियार भागा।
दो तीन लोग ही मेरे दाएं थे।
उनके कुछ समझते के पहले ही मैं जुलूस के बाहर था।
और तब मैंने गौर किया।
उन सबके बूढ़े नेता का गला उसके बाकी शरीर से कम से कम 6 इंच दूर था।
हे भगवान!ये क्या हो रहा मेरे साथ आज।

मैंने अपने आप को संभाला।
बाल बाल बचा था कुत्तों से।
कुत्ते?
फिर पीछे से भौं भौं की आवाज।
अबकी मैं भागने वाला नहीं था।
आगे जुलूस था। उस में नहीं जाना था।
लेकिन अबकी केवल आवाज आई थी भौंकने की, कुत्तों की।
कुत्ते नहीं आये थे।

मैं सहमता हुआ आगे बढ़ा।
ये रात क्या क्या दिखाने वाली थी।

कुछ देर अपनी सांसें साध कर उसी सड़क पर मैं भारी कदमों से आगे बढ़ चला। पीछे जाने का सवाल नहीं था।
बहुत डर लग रहा था, बहुत ज्यादा।
कुछ दूर आगे फिर सफेद सी रोशनी दिखी मुझे।
हल्की सी आवाज़ें भी आ रही थीं लोगों की बातचीत की।

मेरे आगे बढ़ते बढ़ते मुझे दिखा शायद ये एक ढाबा था।
हां ये एक ढाबा ही था।

लकड़ी के खंभों पर सफेद ट्यूब लाइट्स लगी थीं सड़क के दोनों ओर।
दाईं तरफ खुले में कई चारपाई पड़ीं थीं और ट्रक और टैंपो वगैरह खड़े थे। कुछ लोग खाना खा रहे थे। कुछ दारू पी रहे थे। गंदे कपड़े पहने कुछ कम उम्र के लड़के आर्डर सर्व कर रहे थे।
कुत्ते घूम रहे थे । गंदगी थी।

बाईं तरफ खुले में कुछ अच्छी टेबल कुर्सियां थीं जिनपर शक्ल से ही अमीर दिखते कुछ लोग खा पी रहे थे। शांति थी और सफाई भी। उसी तरफ पीछे एक रेस्टोरेंट सा दिख रहा था जिसमें से कुछ पॉश टाइप लोग निकलते दिखाई दिए मुझे।
मैं बीच में खड़ा था ।
अचानक मुझे महसूस हुआ कि मुझे भूख लगी है।
बहुत जोरों से अहसास हुआ भूख का।
बहुत जोरों से।
दाईं तरफ की गंदगी और चिकचिक ने मेरा मन बना दिया कि बाईं तरफ के रेस्टोरेंट में चला जाए।
बाहर कई टेबल खाली थीं,पर मैंने अंदर रेस्टोरेंट में जाना उचित समझा।
सर्दी भी थी।
अंदर बहुत भीड़ थी। लगभग सारी टेबल फुल थीं ।
केवल एक टेबल ऐसी थी जो दो की थी एकदम कोने में थी लेकिन उस पर भी एक आदमी था।
मैं उसी टेबल पर पहुंचा।
टेबल काफी चौड़ी थी और दोनों तरफ एक एक कुर्सी पड़ी थी।
वो व्यक्ति दीवार की तरफ मुंह किए बैठा था और मैं रेस्टोरेंट के दरवाजे की तरफ मुंह करके बैठ गया।
मीनू तुरंत रख गया था एक सूटेड बूटेड वेटर।

सामने वाला आदमी टेबल पर मुंह रखे लेटा था। मैंने गौर किया, इस मीनू में मेरे खाने लायक़ कुछ था ही नहीं।पूरा मीनू नॉनवेज खाने से भरा था
मैंने वेटर को बुलाया।
“वेज में कुछ नहीं है क्या?”
“मैगी मिल सकती है बस।”वो अदब से बोला “और मैगी के साथ टोमैटो सूप भी फ्री है सर । सही रहेगा।”
“ओके कर दो मैगी फुल प्लेट बड़ी वाली । बहुत भूख लगी है हमें।”

“हमें भी।”

मैं थोड़ा चौंका।
मेरी तो भाषा ही हम तुम वाली है।
ये सीधा मैं से हम पर कैसे आ गया ?
इसका मतलब क्या हुआ ?
शक्ल से तो सरदार सा लग रहा है।

खैर।

इस रेस्टोरेंट की मैगी शायद वाकई में दो ही मिनट में बन जाती थी।
जल्द ही फुल प्लेट मैगी गाजर मटर के साथ मेरे सामने थी और टमाटर का सूप भी ।
“सूप कुछ ज्यादा ही लाल नहीं है?”

मेरे सामने टेबल पर झुका व्यक्ति सीधा हो गया था।
वही बोला था!
वही था !
बगैर चेहरे वाला मेरा रखवाला!

“भूल के भी कुछ खाना पीना नहीं यहां का, वरना इस रेस्टोरेंट से कभी नहीं निकल पाओगे।”
वो बोला।
“तुम्हारे पीछे ठीक दाईं तरफ
एक दरवाजा है।
और सामने मुख्य दरवाजा ।
सामने से किसी के अंदर घुसते ही भाग लो।”
वो बोला।

“जब तक तुम कुछ खाओगे पिओगे नहीं , सुरक्षित रहोगे यहां।” वो फिर बोला ।

“बस चुपचाप सामने देखते रहो। और किसी के यहां घुसने का इंतजार करो। मुझे तुरंत बताना।”

मैं दम साध के बैठ गया।
मैंने गौर किया। रेस्टोरेंट में बैठे सभी लोगों की नज़रे मुझ पर टिकी थीं।
मैं दम साधे बैठा था।

अचानक एक बहुत हैंडसम सा युवक मुख्य दरवाजे से घुसा। कुछ घबराया हुआ सा।

“कोई आया “
“भड़ाक”
मेरा बोलना और उस सामने बैठे मेरे रखवाले का मेरे पीछे की दीवार पे लात मारना साथ साथ हुआ।
एक जोरदार आवाज के साथ मेरी दाईं तरफ पीछे एक दरवाजा खुलना साथ साथ हुआ।
“भाग”
वो बोला और मैं फुर्ती से बाहर निकला।
और दरवाजे के बाहर निकलते ही मुझे कोई दीवार दरवाजा या रेस्टोरेंट नहीं दिखाई दिया था।
ये घने वृक्षों से भरा एक बीहड़ जंगल ही था।

मुझे कुछ होश नहीं था। सामने एक कच्चा रास्ता दिखा।
चल दिया।
थोड़ी दूर चलने पर फिर एक दोराहा सा था।
दाएं तरफ एक कच्चा रास्ता दोनों तरफ बबूल के वृक्ष।
बाईं तरफ डामर रोड थी।
अबकी बार इस रोड पर स्ट्रीट लाईट भी थीं।
मैंने इस बार सोचा, हर बार बाईं तरफ घूम जाता हूं, इस बार दाईं तरफ की सड़क पर जाकर देखता हूं।
कुछ दूर चला और अचानक एक कांटा मेरे जूते का सोल भेद कर मेरे तलवे में चुभा।
दर्द से कराह कर मैंने जूता उतारा, कांटा पैर में गहरा चुभा था ।
खून निकलने लगा था।
मैंने अपने तलवे से खून निकलने वाली जगह पर हाथ लगाया।
खून बहुत था।
पता नहीं क्या दिमाग में आया, मैंने अपना हाथ मुंह में ले जाकर अपना ही खून टेस्ट किया।
दो तीन बार।

पता नहीं क्यों मुझे दिमाग में अजीब सी शांति महसूस हुई।
धीमे धीमे आगे बढ़ा, जूते से कांटा निकाल कर। आगे कुछ खेत दिखे।
गेंहू के।
लेकिन दिसंबर में इतना बड़ा गेंहूं?
एक खेत के किनारे एक 17 18 साल की लड़की बैठी दिखी। उसके हाथ में लालटेन थी और बगल में एक कुत्ता।
सफेद।
कुत्ते ने मुझे देखा लेकिन भौंका नहीं। लड़की ने आंखें उठा कर मुझे देखा।
मैंने उसका चेहरा देखा।
कसम खा के कह सकता था मंगोलियन शक्ल सूरत वाली ये हिंदुस्तानी नहीं थी।

“आगे बढ़ के दाएं मुड़ना। एक तालाब दिखेगा।कोई रोके तो रुकना नहीं। कूद जाना।”
वो ठंडी सी आवाज में बोली।
और चेहरा फिर झुका लिया।
“मैं तुम्हारा विश्वास क्यों करूं?”
मैं बोला।
“मत करो।”
वो उसी ठंडी आवाज में बोली।
और जमीन पर हाथ मार कर उसने एक बिल्ली कहीं से जादू से निकाली और कच्चा चबा लिया उसे।
बिल्ली की म्याऊं म्याऊँ की आवाज उसके मुंह में घुट कर रह गई थी।
इस वीभत्स दृश्य को देख मुझे उल्टी सी आ गई।
मैं आगे भागा।
“विश्वास बड़ी चीज है।”
उस लड़की की आवाज गूंजी ।
बहुत तेज।
मैंने पलट कर देखा।
वहां वो सफेद कुत्ता तो अभी भी था। लड़की नहीं थी।

आगे बढ़ा तो फिर एक दोराहा दिखा।
बाईं तरफ एक सहज स्वाभाविक सा मोड़ दिख रहा था जिसके बाद एक चौड़ी सी कच्ची सड़क थी।
दाईं तरफ एक पगडंडी।
मैंने उस मंगोलियन लड़की की बात मानी।
दाएं मुड़ा।
“विश्वास बड़ी चीज है ।”
मेरे कानों में गूंज रहा था।

आगे वाकई एक तालाब था।
मैं हिम्मत करके उसमें कूदने की सोच रहा था।
पर तभी मुझे अपने ठीक बाएं वही चेहरा रहित आदमी दिखा जो पहले मेरी मदद करता रहा था।

“कूदना मत ।”
वो बोला।
“वो लड़की तुम्हें भटका रही है।”
“ओके”
मैंने उसे देख कर मुस्कुरा के कहा।
मैं फैसला कर चुका था।

उस चेहरा रहित आदमी की आवाज बिल्कुल भी उस आदमी जैसी नहीं थी जो अब तक मुझे बचाते चला आया था।
शायद वो काली शक्ति भी समझ चुकी की थी कि मैं उसे पहचान गया हूं।
वो मुझ पर झपटा गुर्राकर।
और मैं बिना सोचे समझे तालाब में कूद गया।

पानी बहुत ठंडा था।
मुझे अचानक ही उस तालाब में एक स्टीमर दिखाई दी।
और उस नाव में बंदर।
लेकिन ये बंदर सूटेड बूटेड थे।
शक्ल के अलावा पूरी बॉडी इंसानों की थी।
नाव अचानक मेरे पास आई।
मैंने डर के मारे डुबकी लगा ली
“यही है।”
“हां यही है।”
मुझे सुनाई पड़ा।
दो मजबूत हाथों ने मुझे पकड़ कर ऊपर खींच लिया।
मैं स्टीमर की डेक पर उन बंदरों के बीच था और वो सब बिल्कुल शांत होकर मुझे देख रहे थे।

ये मित्र थे या शत्रु?
क्या पता?

मैंने आंखें बंद कर लीं।
अब मैं कुछ और कर भी नहीं सकता था।

मेरी छाती पर मुक्के जैसे पड़े और मेरी आँखें खुल गईं।
“ये क्या?”
मैं तो अपने शहर के अस्पताल में था।
यहां कैसे आया?

कई डाक्टर थे मेरे अगल बगल।
एक दूसरे को बधाई दे रहे थे।
मेरी पत्नी एक तरफ खड़े आंसू बहा रही थी।

मुझे मेरी पत्नी ने बताया पिछली रात मैं साढ़े बारह के अलार्म बजते ही उठा था किचन में अचानक फिसल के गिरा था और बेहोश हो गया था।
थोड़ी देर मेरे होश में आने का इंतजार करने के बाद भी जब मैं होश में नहीं आया तो उसने घरवालों, पड़ोसियों को बुलाकर मुझे अस्पताल में भर्ती करवाया था रात में ही।
“और एक बात!”
मेरी पत्नी ने बताया था।
“एक दुबला पतला लड़का था 16 17 साल का। रात में ही आया था।बोला आपके घर के मंदिर में हनुमान जी की पूजा करना है आपके पति की भलाई के लिए।
मुझे कई बार मंदिर में दिखा था। मैंने इजाजत दे दी थी।”
“अभी भी शायद घर पर हो । फोन करके पूंछती हूं मालती से।”
वो बोलीं
मालती मेरी घर की विश्वसनीय कामवाली थी।
मालती ने बताया कि वो लड़का आधे
घंटे पहले ही निकल गया था मेरे घर से।
रात भर तो हनुमान जी की मूर्ति के आगे कुछ पाठ करता रहा था।

दो दिन में अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी। मैं उस लड़के से मिलना चाहता था।मिला भी वो ।
हनुमान मंदिर में।

मेरी पत्नी ने उससे मिलवाया।
उसने गंभीरता से कहा।
“बहन जी आप मंदिर में चलिए। भाई साहब से कुछ बात कर लें हम।”
मेरी पत्नी मंदिर के अंदर चली गईं।
“धन्यवाद! मेरे लिए प्रार्थना करने के लिए।”
मैं बोला।
वो तेज आवाज में हंसा।

“विश्वास बड़ी चीज है।”

मैं भी हंस पड़ा।
“तुम थे?”
“हां मैं ही था।”
वो खिलखिलाया।
“हर जगह। बस में ,जुलूस में, रेस्टोरेंट में और वहां पर कुत्ते के रुप में जहां पर वो थीं जो हैं कि नहीं हैं कोई जान ही न पाया अब तक ,जिनके आगे कुछ बोलने की औकात नहीं थी। इसलिए चुप था।”

“स्टीमर पर कौन था?”
“नहीं पता”
वो मजे लेता मुस्कुराया।
“सौरभ और सारिका क्यों थे वहां?”
“उन्हीं की कारस्तानी थी सब। एक तंत्र अनुष्ठान करवा रहे थे बच्चे के लिए। अब कोई मरेगा तो कोई जन्म लेगा न ?”
“मुझे बचाया क्यों आपने?”
मैं बोला ।
“मैंने नहीं बचाया। मुझे आप पसंद नहीं। मुझे आदेश मिला था उनका जो गेंहूँ के खेत में मिली थीं आपको।”

वो बोला।
“उन्होंने क्यों बचाया ?”

“उनसे पूछने की औकात नहीं मेरी “
वो लड़का हंसा।
“आज सुबह आपने कुछ ऐसा किया था जो उन्हें अच्छा लगा था शायद।”
“क्या किया था?”
मैं सोच रहा था।
” कुछ तो विशेष नहीं किया था मैंने।”

“चलो बता देते हैं।”
वो बोला।
“दोपहर में जब आप अपने लिए पेन खरीदने जा रहे थे।
सड़क पर भीड़ बहुत थी। कई गाड़ियां आ जा रही थीं। एक छोटी बच्ची कागज़ का हवाई जहाज़ उड़ा रही थी जो बीच रोड पर आ गया था। वो उसे उठाने बीच सड़क जा रही थी लेकिन आपने उसे रोका कि ट्रैफिक बहुत है , उसे किनारे रोक कर आपने उसका वो कागज का जहाज़ उठा के उसे दिया था और फिर कुछ देर खेले थे आप उस लड़की के साथ ।”
“हां ! “मुझे याद आया।
“उस लड़की के साथ खेला क्या था।बस एक दो बार वो कागज का जहाज़ उड़ाया था और उससे बोला था। ऐसे रास्ते पर खेलने वाले बच्चों को उनकी मम्मी बिल्ली खिला देती हैं।”

वो लड़का खिलखिला के हंसा।

“बस । वो वही थीं जो हैं भी या नहीं भी। कोई जान नहीं पाया आज तक।”

मेरी पत्नी मंदिर में ही थीं अब तक।

और जब हम मंदिर से वापस लौटने लगे तो एक गोलगप्पा जैसे गालों वाली मोटी तगड़ी पांच छह साल की बच्ची तोतले शब्दों में ये कहते हुए हमारे सामने से निकल गई थी।

“विछवास बली छीज है”।
आपका -विपुल
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2 thoughts on “विश्वास बड़ी चीज है

  1. Horror story bhi kamaal ki likhte ho vipul bhaiya…. Kuch bhi likho aap badhiya hi hota hai😁

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