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आपका -विपुल

विपुल

अनवरगंज रेलवे स्टेशन पर था ।लखनऊ जाना था।ट्रेन का इंतज़ार था, सुबह के पौने दस थे।

फोन बजा ।
“ये महिषासुर की फोटो क्यों आ रही बन के फोन में ?”
“ओह ,बॉस है ! “

“जी सर!आदेश करें ।”कोयल को भी मात देती आवाज़ में ढाई बोरा शहद लपेटकर मैं एकदम आज्ञाकारी लहज़े में बोला।मन में ये सोचते हुये “इस को कैसे पता चला ,मैं आज छुट्टी मार रहा हूँ?”

“सुनो ।कानपुर में हो ?”
“जी सर ।”
“सदर कचहरी ऑफिस चले जाओ ।मिश्रा जी वकील साहब मिलेंगे।एक जवाब दावा है ।उसका ड्राफ्ट देंगे।वो लेकर एक कपूर साहब हैं उनको देना ,वो आज ही दिल्ली जा रहे हैं।दोनों के नंबर सेंड कर रहा हूँ ।इतना करके फोन करना ।”
बॉस ने भी बड़ी प्यारी आवाज़ में कहा।
“कोई फीस भी देनी होगी न उनको सर ?”मैं भी कच्ची गोलियां नहीं खेला था ।”या आपके अकॉउंट से रहेगा ?”
“हा हा हा।”बॉस की हंसी कलेजा छील गई।
“यार विपुल !कभी कभी रुपये खर्च भी कर लिया करो।दीमक लग जाएगी अगर खर्च नहीं करोगे।”
“जी सर !”जिसका भावार्थ था “bsdk “
“ओके !जिसका शाब्दिक अर्थ था “भाड़ में जाओ।”
टिपिकल बॉस एम्प्लाई संवाद।

सारे काम छोड़कर अनवरगंज से कचहरी पहुंचा।मिश्रा जी भले आदमी थे।चाय के साथ पकौड़े भी खिलाये ।टाइप के तीन सौ ,उनकी राय के सात सौ ।कुल 500 के दो नोट खर्च करके मैं कागज़ लेकर चलने ही वाला था कि चाय वाला पैसे मांगने आया।
“आज के 50 ,पिछले दो सौ पचास”बेसुरी आवाज में बाबू चाय वाला बोला।
मिश्रा जी ने पैसे देने का इशारा मुझे किया।
चूँकि मिश्रा जी बॉस के मित्र थे, इसलिए मना नहीं कर पाया।
लेकिन उनको लेकर मेरे विचार बदल गए।
“मिश्रा जी भले आदमी नहीं थे।”

कपूर साहब सर्वोदय नगर में रहते थे।उनसे अपॉइंटमेंट लेकर उनके बंगले में पहुंचा।।
प्रेम से स्वागत किया।मीठी आवाज़ ।पूरे कागज़ चेक किये।बड़े वकील थे।सुप्रीम कोर्ट जा रहे थे।मिश्रा जी 45 के थे तो ये 60के थे।।कॉफी मिली।डायबिटीज पेशेंट वाले बिस्कुट भी ,जो केवल अमीर लोग खाते हैं।
भले आदमी लगे मुझे कपूर साहब।

“तो सर !मैं चलूं ?”

“इस फ़ाइल का खर्चा देते जाओ “
“कितना ?”
“दस हज़ार !”
“कपूर साहब भले आदमी नहीं थे।”

कपूर साहब को विदा करने के बाद बॉस को फोन किया।उसने छुट्टी दे दी 2 दिन की।आधा दिन खराब हो चुका था।लखनऊ का प्रोग्राम कैंसिल किया।बिग बाजार रेव एट मोती पास ही था।
वहीं घुस गया।
कॉफी हाउस में डोसा खाने के बाद ध्यान दिया ।आज विक्रम वेधा फ़िल्म भी तो रिलीज हुई है ।हृतिक रोशन और सैफ अली खान वाली।
1 बज रहा था।
1.15 का शो था।
टिकट काउंटर पर भयानक अनुभव हो चुके थे, इसलिये ऑनलाइन टिकट बुक करने की कोशिश की।ए -12 सीट खाली थी ,बुक करने की कोशिश की ,लेकिन बुक नहीं हो पा रही थी।
टिकट काउंटर पर वही पिस्टल पाण्डे था, पहले से ही देखने से संघी फासिस्ट दिखता था, आज तो तिलक भी लगाए था।

“हाउसफुल है ।”उसने मेरे कुछ कहने पहले ही कह दिया ।”सॉरी।”
“पर नेट पर तो 90 परसेंट खाली सीटें दिखा रहा ।”
मैंने सहम के पूँछा।
संघी फासिस्टों से डरना उचित ही है ,पता नहीं कब जय श्रीराम बोलकर हमला कर दें?
“तो नेट से लेले न ।”वो गुर्राया।
मुंह से तो वो यही बोला था लेकिन उसकी आंखें बोल रही थीं
“बुजुर्ग समझ के हर बार छोड़ देता हूँ।हर नई फिल्म पे मुंह उठा के चला आता है।”
मैं मन मसोस के निकलने ही वाला था कि भूरे सलवार सूट में एक गोरी नवयुवती बोली।
“अंकल !मैंने टिकट ली थी ,अब नहीं चाहिए।आप चाहे तो ले लें।”
बाकी सब ठीक था
उस नवयौवना का अंकल कहना खल गया।
“क्या बाल कलर करवाने का टाइम आ गया ?”
खैर उसने ए -12 की टिकट ही दी थी मुझे।
बढ़िया।
आज दिन बढ़िया था।
लिफ्टमैन लड़का भी गज़ब हरामी था, मुझ पर हमेशा तंज कसता था, इसलिए लिफ्ट छोड़ कर सीढ़ियों से ऊपर पहुंचा।
आज मेरे मोहल्ले का वो लड़का भी नहीं था जो थियेटर में घुसते ही टिकट और सेफ़्टी चेकिंग करता था।
मैदान साफ था।
आज मेरा अच्छा दिन था।

215 रुपये की कॉफी सॉरी सॉरी कैपेचीनो और 80 रुपये के दो समोसे आर्डर करके मैं अमीरों वाली फील ले ही रहा था कि बगल में एक मृगनयनी महिला मधुर आवाज़ में बोलीं।
“कौन सी सीट है आपकी ?”
“स्क्रीन 3 ,ए -12 “
“ओह !औऱ कोई भी है साथ में ?”
मेरा माथा ठनका।अंदर का ईमानदार शरीफ और ब्रह्मचारी इंसान जागृत हुआ ।
ये इतना क्यों पूँछ रही है ?इससे पीछा छुड़ाना ही उचित।
“जी मेरा दोस्त आ रहा है।”
“ओके ! मैं एस आई चेतना चौहान ।”उस महिला ने मुस्कुरा के कहा।”रूटीन चेकिंग।”
“आपके दोस्त का नाम क्या है ?”
“अमीश “
“जी?”
“अमीश दुबे “मुझे बचपन के एक दोस्त का नाम याद आ गया था ।

चूँकि पुलिस थी, महिला थी ,इसलिए एक कॉफी सॉरी कैपेचीनो मैंने उनके लिये भी आर्डर की।
नई भर्ती थी, फतेहपुर की थीं।बिकरू काण्ड के बारे में जानने को बड़ी उत्सुक लग रही थीं।मैंने उन्हें पंडित जी के बारे में बहुत बताया।

मित्र पुलिस
चेतना चौहान मित्र पुलिस थी।


खैर!
मैं अपनी सीट पर पहुंचा । ज़्यादातर हाल खाली था ,लेकिन बड़ा अजीब लग रहा था।हॉल में मादा प्रजाति विलुप्त थी और हॉल में मौजूद पुरूष कुछ ज़्यादा ही हट्टे कट्टे थे ।
अरे ये क्या ?

मेरा मोबाइल कहाँ ?

जेब में नहीं था।
राष्ट्रगान के उपरांत मैं मोबाइल लेने बाहर भागा।

बाहर से चेतना चौहान दो बॉडी बिल्डरों के साथ तेज़ी से अंदर आ रही थी।
“पकड़ो !भाग रहा !पकड़ो!”
मैंने बस इतना ही सुना ।

दाहिने गाल पर एक करारा प्रहार ।

चेतना चौहान मित्र पुलिस नहीं थी।

मैं ज़मीन पर।
सेकण्डों में ,
नहीं नहीं
मिली सेकण्डों में मेरे हाथ पीठ के पीछे बंधे थे औऱ मुंह में कपड़ा।
“क्या करें ?”
“इसे यहीं रखो ।बाकी साथी इसके आते ही होंगें।”
“सीट के नीचे डाल दें ।”
“डाल दो ।”
मैं कुछ समझ पाता,उसके पहले ही मुझे मुंह में कपड़ा ठूँस, कानों में आटे की गोली में 5 रुपये का सिक्का ठूंसकर ,आंखों में काली पट्टी डाल कर सीट के नीचे डाल दिया गया।

आज का दिन बढ़िया नहीं था।
ज़्यादा नाजुक हूँ, इसलिए बेहोश हो गया।
होश तब आया जब ,मुझे सीट के नीचे से घसीट के निकाला गया और आँख कान की की पट्टी खोल कर पूँछा गया ।
कानपुर का राणातुंग डिजाइन थ्री स्टार इंस्पेक्टर मेरी खबर ले रहा था।
“तेरे बाकी साथी क्यों नहीं आये ?क्या हमारे ऑपरेशन की खबर लग गई थी उन्हें ?”

“कौन सा ऑपरेशन सर ?कौन से साथी “

मैं शरीफ आदमी हूँ ।ये मेरे साथ गलत कर रहे आप ।”

“सर इस शरीफ आदमी के फोन में पीएफआई की 500 सर्च निकली हैं और बैक कवर में 3 विभिन्न आई कार्ड ।”
मेरे साथ कैपेचीनो गटक चुकी चेतना चौहान चूकी नहीं अपने अफसर के सामने अपनी काबिलियत दिखाने को ।
मुझे एक कुर्सी पर बिठा दस पुलिस वाले मेरे अगल बगल खड़े थे।
“कौन है तू ?”
इंस्पेक्टर ने घूरा।
“जी मैं विपुल गन्ना विकास विभाग में क्लर्क ।”
“तू रेशम विभाग में गन्ना उगाता है ?”
“जी”
“जी के बच्चे।ये तेरी आई कार्ड तो रेशम विभाग की है।”
“सर !ठेका लिया था रेशम विभाग की कम्प्यूटराइज्ड आईडी बनाने को।दोस्त है वहाँ।ये सैम्पल बनाया था।”
“खादी विभाग में भी दोस्त होंगे न ?”
“नहीं वहाँ बापू हैं।”
तड़ाक,
तड़ाक
तड़ाक
तीन चांटे खाने के बाद समझ आया इंस्पेक्टर को बात बुरी लग गई थी।
मैं खुद को मन ही मन कोस रहा था।सोच रहा था कि ये शौकिया विभिन्न विभागों के आई कार्ड बनाना कितना गलत काम था ।

खादी, रेशम, गन्ना विकास ।गनीमत है तीन ही कार्ड बनाये थे।

“देख ,अपनी असलियत बता ।हमारी छानबीन के अनुसार आज कानपुर जेबकतरा एशोसिएशन के सरगनाओं को विक्रम वेधा देखने आना था।हमें ये भी पता है कि उनके चेयरमैन के नाम स्क्रीन 3 ए -12 टिकट बुक थी।”चेतना चौहान की चेतन आवाज़ गूंजी।

मैंने उनको बताया कि यहाँ का स्टाफ मुझको जानता है, पुँछवा लो।
मेरे मोहल्ले के टिकट चेकर और लिफ्टमैन की गवाही हुई।पिस्टल पाण्डे की भी गवाही हुई।सबने यही कहा कि ये सज्जन हर फिल्म देखने आते हैं ।अय्याश और छिछोरे जरुर हो सकते हैं, पर जेबकतरे नहीं।
पुलिस वाले नहीं मान रहे थे।
मोहल्ले के टिकट चेकर ने मेरी पत्नी को फोन किया।
वो दरवाजे पर आई ही थीं
कि उनको पीछे कर एक दरोगा अंदर तेज़ी से घुसा ।
वो मेरा बचपन का दोस्त था।

उदयवीर सिंह चौहान ।
घर का नाम सत्या।

सत्या मेरा अच्छा दोस्त था।
वो कुछ और बताने वाला था, पर मुझे देख कर पूँछा ।
“सर विपुल जी को क्यों बांध रखा है ?”
“जानते हो इन्हें ?”
“क्यों नहीं सर ।बहुत सुलझे हुये आदमी हैं।जब मैं आईआईटी चौकी में था,दो लेस्बियन महिला प्रोफेसरों में हुआ विवाद इन्हीं ने सुलझाया था “

“अच्छा “
“जी सर !आईआईटी की महिला फेमिनिस्ट ग्रुप के मेंबर हैं ।इनकी बड़ी इज़्ज़त है आई आई टी की महिला प्रोफेसरों में ।”सत्त्या ने बड़े नम्र लहजे में कहा।
“काम क्या करते हैं ये ? इंस्पेक्टर का सवाल अपनी जगह ठीक ही था।
“लेखक हैं !”कोकिला की सुहागरात,लेडी डॉक्टर का प्यार ।किताबें लिखी हैं।उल्लू एप के मेन रायटर हैं।

“Bsdk “
“ये मेरा कौन सा इंट्रोडक्शन हुआ बे ?”

सत्या मेरा दोस्त नहीं था।
पुलिस से बच गया।
पत्नी से पिट गया ।
बाकी विक्रम वेधा बहुत अच्छी फिल्म है।
माधवन और विजय सेतुपति की गजब एक्टिंग है, गज़ब कहानी है।
ये हृतिक रोशन और सैफ अली खान वाली मनहूस है।
मेरे साथ ये हुआ।आप देखने जाओगे ,पता नहीं क्या क्या हो ?
घर पर रहें
सुरक्षित रहें
आपका -विपुल

विपुल

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3 thoughts on “मेरा रिव्यू -विक्रम वेधा

  1. गुरु पिक्चर देखने जाते हो या कांड करने ।

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