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आपका – विपुल

गंभीर पोस्ट
बहुत दिनों से लिखना चाहता था ये।
मेरे एक बड़े भाई के मित्र, मेरे मोहल्ले के ही। पहले कन्नौज में रहते थे, फिर लखनऊ में परिवार रख दिया। खुद नौकरी में आते जाते रहते थे।
अचानक खबर आई उनके छोटे बेटे ने आत्महत्या कर ली।
मैं स्तब्ध रह गया।
22 साल से ज्यादा नहीं होगा।

ऐसी बातों में कुछ बातें बाहर नहीं आने दी जाती, जायज भी है।
अंतिम संस्कार हो गया।
जो बात थी, बार बार नहीं बता सकता, पहले लिख चुका।
मैं उसी बारे में कुछ कहने की कोशिश कर रहा हूं, उसे अगर ध्यान से समझ पाएं वो लोग जिनके लिए कह रहा हूं। कुछ उदाहरण भी दूंगा।

देखो, आप तभी कुछ कर सकते हैं, जब तक क्रीज पर हैं।
क्रीज पर से हटने के बाद कुछ भी नहीं कर सकते।
मानव जीवन अनमोल है और वाकई अनमोल है।
मुझे हिंदू पुरातनपंथी कह लो, पर क्या जरूरी था कि भगवान तुम्हें मानव जन्म ही देता?
बैल और गाय छोड़ो,
छिपकली और मेंढक भी बन सकते थे तुम।
जरा सोचो!
ईश्वर ने कुछ सोच के ही तुम्हें मानव जन्म दिया होगा, कुछ भरोसा कर के।
और अगर आत्महत्या का विचार मन में लाते हो तो उसका अपमान नहीं कर रहे?
ये वैसा ही है जैसे बीसीसीआई किसी रणजी खिलाड़ी का चयन विश्वकप के लिए करे और वो रणजी प्लेयर जबरन हिट विकेट होकर लौटने की सोचे?
सरासर बेवकूफी!

आत्महत्या के इच्छुक व्यक्तियों के कई ऐसे कारण होते हैं जिनसे परेशान होकर वो कष्ट से मुक्ति चाहता है, आत्महत्या की सोच के।
पर एक बार समस्याओं को निपटाने की भी तो सोच लो।
बीच मैच से भाग कर केवल अपने अलावा अपने परिवार के लिए समस्याएं ही तो पैदा करोगे?
एक उदाहरण देखना 2011 विश्वकप

भारत बनाम पाकिस्तान का सेमीफाइनल।
सचिन की इस 85 रनों से ज्यादा बेहूदा पारी शायद ही रही हो।


सचिन बिलकुल नहीं खेल पा रहे थे शुरुआत के बाद।
कैच छूट रहे थे, पगबाधा अपीलें, बल्ला गेंद से कनेक्ट नहीं हो रहा था, रन नहीं आ रहे थे।
क्या किया था उसने?
खुद हिटविकेट होकर लौट आया?
नहीं न?
जैसे तैसे भी हो सचिन खड़े रहे, बेशकीमती रन बनाए और उन 85 बेहूदा रनों के लिए शायद मैन ऑफ द मैच भी ले गए थे।
भारत फाइनल में पहुंच गया, जीता।
सचिन निराश हो जाते खुद से। फिर?
और अभी हाल में ही 2022 की दीपावली पर कोहली की पारी ध्यान होगी।
पांड्या की याद है?
वो भी खेल नहीं पा रहा था।
पर टिका तो रहा।
भारत मैच जीता।
कठिनाइयों में पड़कर खुद को समाप्त करना बेवकूफी होती है। निकलने का तरीका खोज लो।
और सबसे पहला तरीका बेशर्म बनना ही होता है।
आइसिस की सेक्स स्लेव बनी महिलाएं जब अपनी पहचान उजागर कर इज्ज़त से रह सकती हैं!
सनी लियोन सारे कर्म करवा कर भी टीवी और फिल्मों में बड़े शान से दिख सकती हैं तो तुम्हें क्या दिक्कत?
घोषित सजायाफ्ता लालू यादव टीवी पर ज्ञान पेल सकते हैं, आतंकवादी डेविड हेडली को खुला सपोर्ट देने वाले मुंह नहीं छुपा रहे और फिक्सिंग में दोषी करार अजहर और श्रीसंत जब नहीं शर्माते,
तो तुम्हें क्या दिक्कत?
दूसरी बात जो भी जैसी भी समस्या हो , अपने पिता को ज़रूर बताओ।
पिता से बढ़िया बचाव कोई तैयार ही नहीं कर सकता।
तीसरा धर्म जरूरी है पर कर्म भी।
आत्महत्या से ईश्वर नहीं मिलते भाई।
बस इतना ही।
आपका – विपुल
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One thought on “आत्महत्या क्यों ? बेशर्म बनो

  1. तीसरा धर्म जरूरी है पर कर्म भी।
    आत्महत्या से ईश्वर नहीं मिलते भाई।
    बिल्कुल सही कहे आप … बाकी गरुण पुराण में लिखा हैं आत्महत्या करने वाले काली पहाड़ी का काला नाग बनते है…

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