
अहम का वहम
घमंड एक बुरी चीज है।
ये सबको ही पता है।
किसको नहीं पता?
फिर भी लोग घमंड करते ही हैं।
रूप का, दौलत का, बुद्धि का, बल का, चातुर्य का।
जो जिस चीज में अव्वल है, उसका घमंड उसको होता है।
ये अनोखी चीज नहीं है।
ये नॉर्मल ही है।
मुझे भी घमंड हुआ करता था।
कभी कभी अभी भी हो जाता है।
पर अब पहले की तरह ज्यादा देर नहीं रहता।
दिमाग उम्र बढ़ने के साथ और वक्त की ठोकरें खाने के बाद ज्यादा खुल जाता है न?
क्या बोलें और फिर भी कुछ वो लिखने की कोशिश कर रहे हैं जो अभी दिल में है। पढ़ते रहना अगर टाइम हो तो।
कुछ अवसरों पर घमंड दिखाना लाजिमी है और जरूरी भी ,जब सामने वाला आपको अर्दब में लेने की कोशिश कर रहा हो और वो आपसे कमतर हो।
पर ज्यादातर समय नहीं।
हर जगह वास्तविक दुनिया में, वर्चुअल दुनिया में लड़ाई अहम की ही है और अहम इसलिए अच्छा नहीं माना जाता क्योंकि अहम वहम पैदा करता है।
खुद के सर्वशक्तिशाली, बलशाली, विद्वान होने का।

और अहम से जन्मा ये वहम आदमी के पतन का असली कारण होता है।
जब एक सिपाही में अहम हो जाता है तो वो खुद को पुलिस कप्तान से ज्यादा पावरफुल समझने का वहम पालने लगता है।
जब एक बाबू में अहम हो जाता है तो वो खुद को डी एम से ज्यादा पावरफुल समझने का वहम पालने लगता है।
जब एक पत्रकार में अहम हो जाता है तो वो खुद को अपनी मीडिया कंपनी मालिक से ज्यादा पावरफुल समझने का वहम समझने लगता है।
और जब एक सोशल मीडिया सेलेब्रिटी को ज्यादा अहम हो जाता है तो वो खुद को स्थापित सत्ताओं से ज्यादा पावरफुल समझने का वहम पालने लगता है।
और इन लोगों को अपना नुकसान तब तक नहीं समझ आता जब तक उनके अहम से निकला ये वहम काफी बड़ा नहीं हो जाता।
और हँसी की बात कहो या सीरियस में समझो , एक अरबी या फारसी की कहावत है कि वहम का इलाज तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं होता।
हकीम लुकमान मतलब जो हर मर्ज का इलाज कर सकने वाला हकीम है।

सच्ची बात ये है कि अपने अहम से उपजे वहम को पाल लेने वाले लोगों का इलाज संभव नहीं क्योंकि अहम से उपजा वहम भी उसी तरह एक लाइलाज बीमारी है जैसे एड्स या अस्थमा।
पुरानी कहावत है कि दमा (अस्थमा ) दम निकलने के साथ ही जाता है
और मैं ये कहना चाह रहा हूं कि अहम से उपजा वहम व्यक्ति का सर्वनाश करके ही जाता है।
किसी भी व्यक्ति का अहम चरम पर तो पहुंच सकता है पर किसी भी व्यक्ति का अहम स्थाई नहीं हो पाता।
भगवान नहीं होने देता और न ही समाज।
क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।
हर व्यक्ति को किसी न किसी दूसरे की जरूरत पड़ती ही है।
हर हाल में हर दौर में हर जगह पर हर व्यक्ति को दूसरे की जरूरत पड़ती ही है।
ये कुछ व्यक्ति ठोकर लगने के पहले सीख जाते हैं और कुछ अहम का वहम पाल लेने से उपजे सर्वनाश के बाद।
बस इतना ही।
आपका -विपुल
🙏🙏🙏
सर्वाधिकार सुरक्षित -Exxcricketer.com
